रविवार, 18 अप्रैल 2010

अन्तराष्ट्रीय स्वरूप लेती राजस्थानी

                                              अन्तराष्ट्रीय स्वरूप लेती राजस्थानी                             
पिछले कई दिनों से दैनिक भास्कर ने शिक्षा  मेरा अधिकार के तहत ‘‘मातृ  भाषा  राजस्थानी क्यों नहीं’’ इसको एक मुद्दे के रूप में उठा कर जन जन को अपनी मातृ भाषा के प्रति स्नेह ओर प्यार को उभार ने के साथ-साथ सोचने को विवश  कर दिया है। भास्कर में लगातार छप रहे आलेखों, बहस, चर्चाओं आदि सब में एक  ही स्वर निकल के आ रहा है कि प्राथमिक शिक्षा  राजस्थानी में ही होनी चाहिए?
यह कैसी विडंबना है कि जिस भाषा का लोहा व वर्चस्व देश  दुनिया के विद्वान मान चुके है इस पर अपने शोध  प्रबंध लिख चुके हैं और अमेरीका जैसे देश  की शिकागो  यूनिवर्सिटी में इसके अध्यापन की व्यवस्था है। ऐसे में इस महान भाषा को अपने ही घर में अपमानित क्यूं होना पड़ रहा है? मां सीता ने तो अपने पति व अयोध्या के राजा श्री राम के सामने अपनी अग्नि परीक्षा दी थी, लेकिन राजस्थानी भाषा का दुर्भाग्य देखिये कि इसको अपने बच्चों के सामने ही अपनी अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है!
कितना तरस आता है इन आडकाठियों के ज्ञान पर जो बोली और भाषा का फर्क नहीं समझते। यह तो प्रकृति का नियम है कि 12 कोस के बाद बोली बदल जाती है और प्रकृति का यह नियम संसार की हर भाषा पर लागू होता है। जिस तरह एक एक मोती पिरोकर माला बनाई जाती है उसी प्रकार बोलियों का श्रंगार सजा कर साहित्य का सृजन होता है तो वो भाषा बन जाती है ओर वो गढ़-कोटों, गांव-गळी, खेत-खलिहानों, हाट-बाजार आदि में गूंजने लगती है। तब इसके लगातार मंथन से माखण व घी रूपी द्रव्य के समान हमें भाषा रूपी गीत, कहानी, कविताएं, लोरियां, आदि जीवन का सब रस मिल जाता है अर्थात गूंगे को भी जबान मिल जाती है।
मेरे पूर्ववर्ती विद्धान बहुत कुछ लिख चुके हैं और इस भाषा का बखाण करने के लिए मैं समझता हूं कि एक जन्म ही पर्याप्त नहीं है। कई जन्म लेने होंगे, तब ही इसका बखाण कर पायेंगे। जिस तरह सांवरिये की माया का कोई पार नहीं है उसी तरह इस भाषा के रूप, श्रंगार, तेज-बल, शोर्य, विरह आदि के भेद का कोई पार नहीं है। आज लगता है इसका शोर्य  एवं पराक्रम सो गया है। जिसकी वीर रस की कविताओं को सुन कर वीर जलती आग में कूदने को तत्पर हो जाते थे। कविता रूपी वाणी उस बाण का काम करती थी कि उसके एक बैण से तलवारे खड़क उठती थी। इसकी डिंगळ शैली  की कविताएं आज के टेलीविजन के लाइव प्रसारण को भी दूर बिठाती है तो इसकी पिंगळ शैली  की कविताएं प्रत्येक परिवार को अपने पुरखों के कृतित्व को याद दिलाती है।
ज्ञातव्य है कि राजस्थानी में राजपूत षासकों के वीरता व शोर्य  की गाथाओं को डिंगळ में गूंथा गया है तो आम जन (राजस्थान की सभी जातियां) की बैण-सगाई, औसर-मौसर, भात-मायरा, समठावणी-ओढावणी आदि की गाथाएं विभिन्न जातियों के रावों-भाटों द्वारा पिंगळ भाषा में रचित वह बहियां जो हजारों बरसों का इतिहास सहेज कर रखे हुए है। और यह किसी संग्रहालय या पुरालेखागार में नहीं वर्न इन जातियों के रावों-भाटों के पास आज भी जाति-समाज की संपति के रूप में सुरक्षित है।
भारत सरकार की जनगणना के आंकड़े दस बरसों में अपडेट होते हैं। लेकिन इन जाति-समाजों के आंकड़े हर साल अपडेट होते हैं और इन जाति-समाजों में बैण-सगाई, औसर-मौसर, भात-मायरा, समठावणी-ओढावणी में वाकायदा वाचन करने की रीत है जिसे आज भी निभाया जाता है। मेरे स्वयं के सारस्वत समाज के राव हमारे घर-परिवार के हर आयोजनो में उपस्थित होते हैं और हम इनका सम्मान करते हैं और इन्हें दक्षिणा आदि देकर खुद को धन्य समझते हैं। सारस्वत जाति के एक राव श्री हरिकिशन  के अनुसार पुरखों की इस जजमानी को हमें आज भी निभाते हुए हर्ष  हो रहा है। इनके अनुसार विक्रम संवत 1990 से पहले समाज की सारी बहियां राजस्थानी की पुरानी लिपि मुड़िया में ही लिखी जाती थी। जब देश  में परिवर्तन की धारा चल रही थी ओर हर ओर देव नागरी लिपि को अपनाने का अभियान चल रहा था तो हम भी इस धारा का अनुसरण करते हुए बहियों का लेखन देव नागरी में राजस्थानी की पिंगळ काव्य शैली  में करने को मजबूर हो गये।
इतना ही नहीं राजस्थानी के बात साहित्य की भी लूंठी परंपरा और इतिहास रहा है। जिस तरह प्राचीन काल में वेद की ऋचाओं को कंठस्थ करने की रीत थी उसी प्रकार राजस्थानी का मौखिक बात साहित्य आज भी गांव की चौपालों अर समाजों की जाजम पर उसी तन्मयता के साथ सुना जाता है जिस तरह कोई रंगमंच पर नाटक देख रहा हो या थियेटर में कोई पिक्चर। कहने का मतलब यह कि बात कहने वाला अपनी भाषा, शैली  और हाव भाव से वो दृष्य उपस्थित करने में कामयाब होता है जो किसी चल चित्र या नाटक में देखने को मिलता है। डायलॉग की जगह डायलॉग, गाने की जगह गाना, संगीत की जगह संगीत। कुल मिलाकर इन सारे किरदारों को एक ही व्यक्ति द्वारा निभाकर लोगां का मनोरंजन करने की यह सामर्थ्यता  सिर्फ और सिर्फ इस राजस्थानी भाषा में ही मिल सकती है। इसमें एक बात का ख्याल और रखा जाता है वो है समय का। सभा में मौजूद लोगों से बात कहने वाला व्यक्ति सभा में मौजूद लोगों से समय सीमा को पूछते हुए यह कहता है कि बात बेसवार (मिर्च-मसाले) लगाकर सुनाऊं या सीधी कहूं। सभा की अनुमति अनुसार वो अपनी बात कहते हुए लोगों का मनोरंजन और टाइम पास करता है। आदरणीय विजय दान जी देथा की ’’बातां री फुलवारी’’ ग्रंथ में इसको प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
वाणिज्य संकाय की महाजनी पद्धति जो कि राजस्थानी भाषा की धरोहर है। पिछले दिनों भारत सरकार ने भी दूसरे राज्यों में वाणिज्य संकाय में राजस्थान बोर्ड के पेटर्न को अपनाने का निष्चय किया है। राजस्थानी भासा की इसी मिठास और सामर्थ्यता  का इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिए कि पुरानी रीत को निभाने में संत समाज भी पीछे नहीं है राजस्थान के दो युवा संत राम स्नेही संप्रदाय के स्वामी राम प्रसाद जी और राधा किशन  जी महाराज के ’’नानी बाई रौ मायरौ’’ और भागवत कथा का वाचन भारत के समस्त शहरों  सहित विदेशो  में भी लगातार हो रहे हैं। संस्कार टीवी चैनल इनका सीधा प्रसारण कर रहा है जिसको करोड़ों लोग देखते हैं। इनकी वाणी की ओज ने सभी भाषा और क्षेत्रों की सीमाओं को लांघकर गैर राजस्थानी लोगों को भी अपना कायल बना लिया है। इनके मुखारविन्द से राजस्थानी भाषा में ’’नानी बाई रौ मायरौ’’ का भावपूर्ण वाचन बार-बार सुनने का मन करता है।
इन सबको देख कर अमरीकन विद्वान वेल्फील्ड का राजस्थानी को विश्व  की 25 बड़ी भासावों में मानना एकदम तर्क संगत व व्यवहारिक लगता है। लेकिन यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत की 22 भाषाओं  में शामिल  होने से रोकने  के लिए हठधर्मिता अपनाई जा रही है। कोई  कुछ भी कहे लेकिन राजस्थानी भाषा एक अन्तर्रास्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिस्ठित हो चुकी है और इसके विजय रथ को रोका नहीं जा सकता।

विनोद सारस्वत (राजस्थानी भासा के संपादक एवं लेखक)

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