रविवार, 10 अक्टूबर 2010

करमां रौ लेखो!

जमपुर दरबार सज्यौ है,
करमां रौ लेखौ लेवण नैं।
तीन छंटैल आय खड़या,
म्यानौ आप-आपरौ देवण नैं।।

कैह जमरापुर अठै साचली सरकार,
कूड़-कपट अठै चालै कोनी।
नीं चलै अठै कोई साम-दाम,
म्हारै सूं उंची कोट-कचैड़ी कोनी।।

तीनूं छंटैल दे मूंछया मरोड़,
अेके साथै फुंफकार करी।
म्है इण धरणी रा पूजनीक,
म्हानैं बुलावण री हिम्मत कींकर करी।।

मंतरी-संतरी भरै म्हारी हाजरी,
कलैक्टर, एस. पी. म्हानैं निवण करै।
भणैतर जस रा आखर भणै म्हारा,
कवि-कलमकार बिड़द बखाण करै।।

तांबा-पतरी लिख्या सज्या,
सगळा वांरी साख भरै।
देस-दुनिया देखण रौ पट्टो म्हारै,
अे ठाट-बाट थारै क्यूं अखरै।।

राजसी संनमान सूं उठी अरथी म्हारी,
अणगिणिया पुसब-चक्र चढया म्हारै।
इक्कीस तोपां री सलामी देय,
सगळी नगरी जै-जैकार करै।।

अखबार मीडीया सगळा तरसै,
छेकड़ला चितराम लेवण नैं।
नेता-अफसर बाट जोवै,
दरस छेकटड़ला पावण नैं।।

म्हारै इण महा जातरा दरसाव सूं,
घर वाळा घणा हरख रैया है।
ओ राजसी संनमान देख-देख,
चमगूंगा सा व्है रैया है।।

चालता चितराम ज्यूं सैमूंडै देख-देख,
निजरा पण धोखो खावै ही।
औ बूढल्यौ इयां जासी,
आ सोच-सोच भंवळा आवै ही।।

म्है तीनूं निबीयै सूं पैली जलम्यौड़ा,
दंात औजूं खिरीया कोनी।
रजपूती राज सूं लड़या-भिड़या,
आजादी लावण में कसर राखी कोनी।।

इतरौ सुण जमराजा जोर सूं हाकल करी,
थै तीनूं म्हारै सूं नीं छाना।
थारी इसीजी रपटां पाखती पड़ी,
थै बोलो कै म्हैं खोलूं इसीजी रा पांना।।

थै तीनूं हो करमहीण आ सांपड़ते दीसै,
कूड़-कपट री धजा फरूकावौ।
फोकट री खाय-खाय हाड-हराम बण्या,
अबै उंचौ आसण किण बिध पावौ।।

जै चावौ थै जुगती-मुगती,
कपट गांठ खोलणी पड़सी।
साची-साची बोल बतळावो,
नींतर लख चौरासी भोगणी पड़सी।।

हाको हाक होड मची तीनां में,
पैली म्है, पैली री रट लगावै हा।
अेक दूजै री खोलण पोल,
बूकिया उंचा चढावै हा।।

साईना हा तीनूं छंटैल पण,
केई दिनां-महीनां री छेती ही।
चतरो, पेमो उदो आ बारी जचावै हा,
पैली गुळ गांठ चतरे खोलण री चेती ही।।

चतरो बोल्यो- सुणो महाराज,
म्हैं तो ठैरयौ 14 बरस रौ जाबक टाबर।
जांघियै रौ नाड़ौ इज नीं बंधतो हो,
आजादी किसीक व्है नीं जाणै ओ टाबर।।

कुण लगाई तुगी म्हारै ठा कोनी,
झंडै रै उंधे-मूंधे रौ नीं हो ज्ञान कोई।
हाके-हुक्के रै बिचाळै चाणचक भाज पड़यौ,
पुलिस पकड़यौ जद म्हारै लारै नीं हो कोई।।

पुलिस पकड़यो अर जंतरायौ,
दो दिन पछै छोड छिटकायौ।
केई नेता म्हनैं घणौ बिलमायौ,
नूंवी आजादी रौ पाठ पढायौ।।

अबे हिवड़ै में मन रा लाडू फूटै हा,
जेळ-कचैड़ी घर सा लाग्या।
नूंवी चढी जवानी हेला मारै ही,
म्हारै सांमी सगळा म्हनै ओछा लाग्या।।

इण जोस में अक्कड़ घेरा घालै ही,
चक्कू-छूरा ले म्हैं बाणिया नैं धमकांतो।
पईसा-टक्का लूंट म्हैं मौज उडातो,
हाकां कर-कर म्हैं उत्पात घणी मचांतो।।

म्हारी आ उत्पात लोगां नैं घणी अणखावै ही,
आखता बाणिया थाणै में रपट लिखांता हा।
थाणे अर जेळ सूं म्हारौ नातौ जुड़ग्यौ,
अे सगळा रळ-मिल म्हनै कुटांता हा।।

जेळ सूं इण नातै बिचाळै देस आजाद हुयग्यौ,
अे सगळा मुकदमा आजादी रै खाते में भिळग्या।
म्हनैं मिलग्या तांबा-पतर म्हैं पूजनीक बणग्यौ,
म्हारा साथीड़ा रा मुकदमा भी इण भेळै भिळग्या।।

महाराज ओ साच आज थांरै सांमी परगाास्यौ है,
लोगा म्हनैं माथै बैठायौ म्हारौ कसूर कांई।
म्हनैं लोगां धिंगााणै थुल्डयौ बिड़द बंचाई,
राज रौ माल रूच-रूच खायो तो थांरो कांई।।

अबै पेमो अर उदो भी गांठा खोलण लाग्या,
दोवूं अेके साथै बोल पड़या।
चतरै कैयी जिकी बातां अेकदम खरी है,
इण रै जोस साथै म्हैं भी चाल पड़या।।

म्है भी इण रै साथै हाको-हाक मचाई ही,
रबड़ी, रसमळाई सागै बैठ नैं खाई ही।
अेकर जेळ री हवा खाई,
इण पछै म्हारी भी साख बधी सवाई ही।।

जमराज बोल्या- थांरै इण साच सूं म्हैं राजी हूं,
पण म्हनैं फरज म्हारौ निभाणौ पड़सी।
थै साठ बरस पूजीज्या इण धरणी पर,
अबै फिटकार म्हारली झेलणी पड़सी।।

विनोद सारस्वत,
बीकानेर।











मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

मुख्यमंत्री जी रै नांव खुली पाती!

आदरजोग मुख्यमंत्री जी, अशोक  गहलोत सा, गढ बीकाण सूं विनोद सारस्वत रा पगै लागणा मानज्यौ सा। आगे म्हनैं आप रै राज में इसी कोई खास बात निगै नीं आ रैयी है जिण सूं ओ लखाव व्है कै राजस्थान में सत्ता बदळीजी है! आप री सरकार रौ इसौ कोई काम नीं दीख रह~यौ है जिण सूं ओ लखाव व्है कै आ जनता री चुण्यौड़ी लोकतांत्रिक  सरकार है। आप री टी वी अर अखबारां में घणी ही धन धन व्है रैयी है पण साची बात तो आ है कै इण सूं जनता री गाढी कमाई लाली लेखे लागण रै टाळ कीं नीं व्है रह~यौ है। टी वी अर अखबारां में लूंठा-लूठा विज्ञापन छपवाय नैं आप मन में मोटा भलांई व्हो  पण इण सूं गरीब रै पेट री दाझ नीं बूझै। मतलब हांती थोड़ी अर हुल हुल घणी।
वसुंधरा राज भी आप री तर~यां ही चाल रह~यौ हो पण उण सरकार रा विकास रा काम लोगां नैं सांमी दीखै। हां आ बात साची है कै इण कामां में जम’र जीमण-चाटण व्हिया, जिणां रौ भोग तद रा राजनेतावां अर अधिकारियां कर~यौ। पण आप रै राज में तो इसौ कीं नीं दीठै, फैर भी आप री धन धन व्है रैयी है। आप रै राज में नरेगा योजना में भी इणी भांत रा जीमण-चाटण व्है रह~या है-आप घणी ही लूंठी लूंठी योजनावां रा बखाण करौ पण साची बात तो आ है कै आम आदमी री माळी हालत में कोई सुधार नीं व्हियौ।
आप री सरकार री सगळी योजनावां ही फगत रीत रौ रायतौ बणती सी लागै। हुकुम, भुखो तो धायां ही पतीजै। आप री अे योजनावां उण री भूख मेटण में पूरी तर~यां विरथा रैयी है। कवि मोहम्मद सदीक साहब री कविता मुजब ‘‘थै मजा करो महाराज आज थांरी पांचू घी में है, म्है पुरस्यो सगळौ देस और थांरै कांई जी में है। गळी, गळगळी होय गांव री बिलखै साख भरै अरे, लूचा लूंटै माल मसखरा मीठो नास करै।’’ आ कविता सदीक साहब तीसेक साल पैली लिखी ही अर आज भी हालत वा ही है इण में कोई फरक नीं आयौ।
म्हनैं साफ लागै कै लोकतंत्र अठै आय नैं हारग्यौ। राजसाही नैं लोग पाछी चेते करण लागग्या। राजसाही री वगत जिका पक्का काम व्हिया वै आज भी इण लोकतंत्र नैं चिड़ावै अर लोगां रै माथै चढ नैं बोले कै ओ राज ठीक है या बो राज ठीक हो। आ तो आप नैं भी मानणी पड़सी कै आज भी आप रै शाषण में खास थंब है वो राजसाही रो ईज है। लोकसाही  मे बणयौड़ी ऊंची-ऊंची  आभै नैं नावड़ण री आफळ करती अटटालिकावां कदै भी धुड़ सकै अर धुड़ रैयी है पण राजसाही रै वगत रा बण्यौड़ा जूना ढूंढा  हाल तकात बजर बंट बैठा इण लोकसाही पर आंगळी उठांवता निगै आवै। लोकसाही में घणकरा सरकारी दफ्तर आज भी राजसाही  रा वा ढूंढा में ईज चालै। उण वगत री राजसाही  भी काळ-कसूंबै लोगां नैं रोजगार देवण रा जतन करती पण इण रै हैठळ वै पक्का काम करांवता। पण आज अकाळ राहत रा कामां में सड़कां पर सूं धूड़ौ हटावण रै टाळ कोई दूजो काम नीं व्है रह~यौ अर ओ ईज हाल नरेगा रौ है।
राजसाही रा लोग भी मानता कै भींतड़ा {गढ-कोट} ढह जासी पण गीतड़ा रह जासी। पण वांरा तो हाल भींतड़ा भी कोनी ढह~या अर गीतड़ा तो गाईजता ईज रैसी। सो हुकुम इण लोकसाही में तो म्हनैं इण दोवूं बातां में ही गोळ लागै। क्यूंकै इण लोकसाही अठै री भासा, साहित्य अर संस्कृति नैं तळै बैठावण में कोई कमी नीं राखी। अठै राजपुताना में हिन्दी थरप’र इण क्षेत्र नैं अेक चरणोई रौ रूप दे दीनौ है, जठै हरैक प्रांत रा गोधा चर रैया है अर इण गोधां नैं जै गोधा केवौ तो अै सींग  औरूं मारै। अठै रा जाया जलम्या छोरा इण गोधां रै आगे  मेरिट री  कुश्ती  में नीं टिकै अर सरकारी नौकर~यां पर प्रांतियां रै हाथां में आ ज्यावै। राज में ऊंची-ऊंची  नोकर~यां में पूग’र अठै रा लोगां नैं देस भगती अर कानून रा इसा पाठ पढावै कै अठै रा राजनेता वांरै आगे पागड़ी तो पागड़ी तागड़ी खोलावण नैं भी त्यार व्है जावै।
इसौ कुजोग भोगणौ पड़ रह~यौ है अठै रा राजनेतावां नै। म्हारी बातां खारी व्है सकै, पण खरी है। आप खुद नैंम धरम नैं सैमूंडै राख’र इण साठ बरसी लोकसाही परख राजसाही  सूं करोला तो आप नैं भी ठा पड़ ज्यासी। पण म्हनै लागै कै आप इण नैं भी आ कैय नैं टाळण री चेस्टा करोला कै अे सैंग सुणण में आछा लागै पण बरताव में अैड़ौ नीं व्है सकै। सौ कीं व्है सकै पण इण सारू साची ऊरमा अर हियै में अेक हूंस व्हैणी जोईजै। आगे म्हैं म्हारी सीधी बात पर आऊँ  जिण सारू म्हारै हियै में अेक पीड़ है अर आ इत्ती बडी भूमिका पोळाई है। म्हैं बात करूं आपां री, थांरी-म्हारी अर इण समूचै राजपूतानै री मायड़ भासा राजस्थानी री। आज इण भासा री कांई गत व्है रैयी है आ बात आप सू भी छांनी कोनी। आप किण मजबूरी रै पांण 2003 में राजस्थान विधान सभा सूं सरब सम्मति सूं प्रस्ताव पास करवाय नैं भारत री सरकार नैं भेजायौ हो? म्हनै इण बात रौ ज्ञान कोनी। पण कित्तै दुरभाग री बात है कै राजस्थानी भासा नैं संविधान री आठवीं अनुसूचित मे भेळण में भारत री सरकार ओसका ताक रैयी है। अठिनैं आप रै राज में राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी अेकदम बापड़ी बणगी है, अठै नीं तो अध्यक्ष, सचिव है अर नीं ही कार्य समिति अर सामान्य सभा। अकादमी री मुख पत्रिका  ‘‘जागती जोत’’ डेढ बरस सूं छप नीं रैयी है। कांई आ ईज है इण लोकराज री भासा संस्कृति नीति? म्हनैं ठा नीं आप इत्ता परबस क्यूं हो?
आज बारला मुटठी भर लोग आपां री भासा पर सवाल खड़ा कर रैया है। आप रा शिक्षा  मंत्री अठै री मायड़ भासा हिन्दी बता रैया है। राजस्थान रा कवि, लेखक, हेताळू आद सगळा बोक बोक नैं आ बता रैया है कै म्हारी मायड़ भासा राजस्थानी है। इत्तौ की हुय रह~यौ है पण आप मौनी बाबा री तर~यां मून क्यूं धार राखी है? आप कोई पडूतर क्यूं नीं दे रह~या हौं? आप नैं किण बात रौ संको नैं डर है? आप छाती चवड़ी करनैं क्यूं नीं बोलो? कै म्हारी मायड़ भासा राजस्थानी है. आप हिन्दी रा इत्ता लटटु कींकर व्हैग्या? आप इण लीक नैं क्यूं नीं तोड़ौ? क्यूं नीं आप, आप रै हरैक भासण में राजस्थानी ईज बोलण रौ संकल्प लेवौ? देखां आप नैं कुण रोकै? आप माथै राजस्थान री जनता जनार्दन रौ आसीरवाद है। आस राखूं कै आप पर म्हारी इण बातां रौ असर व्हैला? अर आप हाथूंहाथ राजस्थानी भासा रौ माण बधावण रौ काम कर नैं जस रा गीतड़ा लिखावौला। नींतर म्हैं आ ईज समझूंला कै हिन्दी राजस्थान पर थरप्योड़ै अेक नूंवै उपनिवेसवाद री भासा है अर राजस्थान भारत रौ उपनिवेस है। जदि आप नैं म्हारी बातां खरी लागै तो कोई इसौ पग उठावौ कै सगळां री बोलती बन्द व्है जावै। इणी आस रै सागै। जय राजस्थान, जय राजस्थानी।

विनोद सारस्वत [संपादक-मायड़ रो हेलो}
एफ-841, मुरलीधर व्यास नगर, बीकानेर
जेबी कांनाबाती:- 9928012798

रविवार, 18 अप्रैल 2010

अन्तराष्ट्रीय स्वरूप लेती राजस्थानी

                                              अन्तराष्ट्रीय स्वरूप लेती राजस्थानी                             
पिछले कई दिनों से दैनिक भास्कर ने शिक्षा  मेरा अधिकार के तहत ‘‘मातृ  भाषा  राजस्थानी क्यों नहीं’’ इसको एक मुद्दे के रूप में उठा कर जन जन को अपनी मातृ भाषा के प्रति स्नेह ओर प्यार को उभार ने के साथ-साथ सोचने को विवश  कर दिया है। भास्कर में लगातार छप रहे आलेखों, बहस, चर्चाओं आदि सब में एक  ही स्वर निकल के आ रहा है कि प्राथमिक शिक्षा  राजस्थानी में ही होनी चाहिए?
यह कैसी विडंबना है कि जिस भाषा का लोहा व वर्चस्व देश  दुनिया के विद्वान मान चुके है इस पर अपने शोध  प्रबंध लिख चुके हैं और अमेरीका जैसे देश  की शिकागो  यूनिवर्सिटी में इसके अध्यापन की व्यवस्था है। ऐसे में इस महान भाषा को अपने ही घर में अपमानित क्यूं होना पड़ रहा है? मां सीता ने तो अपने पति व अयोध्या के राजा श्री राम के सामने अपनी अग्नि परीक्षा दी थी, लेकिन राजस्थानी भाषा का दुर्भाग्य देखिये कि इसको अपने बच्चों के सामने ही अपनी अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है!
कितना तरस आता है इन आडकाठियों के ज्ञान पर जो बोली और भाषा का फर्क नहीं समझते। यह तो प्रकृति का नियम है कि 12 कोस के बाद बोली बदल जाती है और प्रकृति का यह नियम संसार की हर भाषा पर लागू होता है। जिस तरह एक एक मोती पिरोकर माला बनाई जाती है उसी प्रकार बोलियों का श्रंगार सजा कर साहित्य का सृजन होता है तो वो भाषा बन जाती है ओर वो गढ़-कोटों, गांव-गळी, खेत-खलिहानों, हाट-बाजार आदि में गूंजने लगती है। तब इसके लगातार मंथन से माखण व घी रूपी द्रव्य के समान हमें भाषा रूपी गीत, कहानी, कविताएं, लोरियां, आदि जीवन का सब रस मिल जाता है अर्थात गूंगे को भी जबान मिल जाती है।
मेरे पूर्ववर्ती विद्धान बहुत कुछ लिख चुके हैं और इस भाषा का बखाण करने के लिए मैं समझता हूं कि एक जन्म ही पर्याप्त नहीं है। कई जन्म लेने होंगे, तब ही इसका बखाण कर पायेंगे। जिस तरह सांवरिये की माया का कोई पार नहीं है उसी तरह इस भाषा के रूप, श्रंगार, तेज-बल, शोर्य, विरह आदि के भेद का कोई पार नहीं है। आज लगता है इसका शोर्य  एवं पराक्रम सो गया है। जिसकी वीर रस की कविताओं को सुन कर वीर जलती आग में कूदने को तत्पर हो जाते थे। कविता रूपी वाणी उस बाण का काम करती थी कि उसके एक बैण से तलवारे खड़क उठती थी। इसकी डिंगळ शैली  की कविताएं आज के टेलीविजन के लाइव प्रसारण को भी दूर बिठाती है तो इसकी पिंगळ शैली  की कविताएं प्रत्येक परिवार को अपने पुरखों के कृतित्व को याद दिलाती है।
ज्ञातव्य है कि राजस्थानी में राजपूत षासकों के वीरता व शोर्य  की गाथाओं को डिंगळ में गूंथा गया है तो आम जन (राजस्थान की सभी जातियां) की बैण-सगाई, औसर-मौसर, भात-मायरा, समठावणी-ओढावणी आदि की गाथाएं विभिन्न जातियों के रावों-भाटों द्वारा पिंगळ भाषा में रचित वह बहियां जो हजारों बरसों का इतिहास सहेज कर रखे हुए है। और यह किसी संग्रहालय या पुरालेखागार में नहीं वर्न इन जातियों के रावों-भाटों के पास आज भी जाति-समाज की संपति के रूप में सुरक्षित है।
भारत सरकार की जनगणना के आंकड़े दस बरसों में अपडेट होते हैं। लेकिन इन जाति-समाजों के आंकड़े हर साल अपडेट होते हैं और इन जाति-समाजों में बैण-सगाई, औसर-मौसर, भात-मायरा, समठावणी-ओढावणी में वाकायदा वाचन करने की रीत है जिसे आज भी निभाया जाता है। मेरे स्वयं के सारस्वत समाज के राव हमारे घर-परिवार के हर आयोजनो में उपस्थित होते हैं और हम इनका सम्मान करते हैं और इन्हें दक्षिणा आदि देकर खुद को धन्य समझते हैं। सारस्वत जाति के एक राव श्री हरिकिशन  के अनुसार पुरखों की इस जजमानी को हमें आज भी निभाते हुए हर्ष  हो रहा है। इनके अनुसार विक्रम संवत 1990 से पहले समाज की सारी बहियां राजस्थानी की पुरानी लिपि मुड़िया में ही लिखी जाती थी। जब देश  में परिवर्तन की धारा चल रही थी ओर हर ओर देव नागरी लिपि को अपनाने का अभियान चल रहा था तो हम भी इस धारा का अनुसरण करते हुए बहियों का लेखन देव नागरी में राजस्थानी की पिंगळ काव्य शैली  में करने को मजबूर हो गये।
इतना ही नहीं राजस्थानी के बात साहित्य की भी लूंठी परंपरा और इतिहास रहा है। जिस तरह प्राचीन काल में वेद की ऋचाओं को कंठस्थ करने की रीत थी उसी प्रकार राजस्थानी का मौखिक बात साहित्य आज भी गांव की चौपालों अर समाजों की जाजम पर उसी तन्मयता के साथ सुना जाता है जिस तरह कोई रंगमंच पर नाटक देख रहा हो या थियेटर में कोई पिक्चर। कहने का मतलब यह कि बात कहने वाला अपनी भाषा, शैली  और हाव भाव से वो दृष्य उपस्थित करने में कामयाब होता है जो किसी चल चित्र या नाटक में देखने को मिलता है। डायलॉग की जगह डायलॉग, गाने की जगह गाना, संगीत की जगह संगीत। कुल मिलाकर इन सारे किरदारों को एक ही व्यक्ति द्वारा निभाकर लोगां का मनोरंजन करने की यह सामर्थ्यता  सिर्फ और सिर्फ इस राजस्थानी भाषा में ही मिल सकती है। इसमें एक बात का ख्याल और रखा जाता है वो है समय का। सभा में मौजूद लोगों से बात कहने वाला व्यक्ति सभा में मौजूद लोगों से समय सीमा को पूछते हुए यह कहता है कि बात बेसवार (मिर्च-मसाले) लगाकर सुनाऊं या सीधी कहूं। सभा की अनुमति अनुसार वो अपनी बात कहते हुए लोगों का मनोरंजन और टाइम पास करता है। आदरणीय विजय दान जी देथा की ’’बातां री फुलवारी’’ ग्रंथ में इसको प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
वाणिज्य संकाय की महाजनी पद्धति जो कि राजस्थानी भाषा की धरोहर है। पिछले दिनों भारत सरकार ने भी दूसरे राज्यों में वाणिज्य संकाय में राजस्थान बोर्ड के पेटर्न को अपनाने का निष्चय किया है। राजस्थानी भासा की इसी मिठास और सामर्थ्यता  का इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिए कि पुरानी रीत को निभाने में संत समाज भी पीछे नहीं है राजस्थान के दो युवा संत राम स्नेही संप्रदाय के स्वामी राम प्रसाद जी और राधा किशन  जी महाराज के ’’नानी बाई रौ मायरौ’’ और भागवत कथा का वाचन भारत के समस्त शहरों  सहित विदेशो  में भी लगातार हो रहे हैं। संस्कार टीवी चैनल इनका सीधा प्रसारण कर रहा है जिसको करोड़ों लोग देखते हैं। इनकी वाणी की ओज ने सभी भाषा और क्षेत्रों की सीमाओं को लांघकर गैर राजस्थानी लोगों को भी अपना कायल बना लिया है। इनके मुखारविन्द से राजस्थानी भाषा में ’’नानी बाई रौ मायरौ’’ का भावपूर्ण वाचन बार-बार सुनने का मन करता है।
इन सबको देख कर अमरीकन विद्वान वेल्फील्ड का राजस्थानी को विश्व  की 25 बड़ी भासावों में मानना एकदम तर्क संगत व व्यवहारिक लगता है। लेकिन यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत की 22 भाषाओं  में शामिल  होने से रोकने  के लिए हठधर्मिता अपनाई जा रही है। कोई  कुछ भी कहे लेकिन राजस्थानी भाषा एक अन्तर्रास्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिस्ठित हो चुकी है और इसके विजय रथ को रोका नहीं जा सकता।

विनोद सारस्वत (राजस्थानी भासा के संपादक एवं लेखक)